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यूरिया और प्रदूषण

चर्चा का कारण
सरकार यूरिया के लिये पोषण आधारित सब्सिडी दर तय करने पर विचार कर रही है

क्या है पोषण आधारित सब्सिडी?

  • यह राशि इन उर्वरकों में मौजूदा पोषण तत्वों के आधार पर तय की जाती है
    सरकार ने वर्ष 2010 में पोषक तत्वों पर आधारित सब्सिडी (एनबीएस) की शुरुआत की थी
    इसके तहत यूरिया को छोड़कर सब्सिडीयुकत फास्फेट और पोटाश (पी एण्ड के) वाले उर्वरकों के प्रत्येक ग्रेड के लिये वार्षिक आधार पर सब्सिडी की राशि तय कर दी जाती है
    एनबीएस दर तय होने से उर्वरक उद्योग में कार्यकुशलता बढ़ाने के साथ ही यूरिया का संतुलित उपयोग भी बढ़ेगा
    इसके साथ ही प्रतिस्पर्धा में भी सुधार आयेगा यह कदम उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल और इस उद्योग में कार्यकुशलता को बढ़ावा देने के लिये उठाया जा रहा है

यूरिया और प्रदूषण

  • दो दशक में छह बड़े औद्योगिक क्षेत्रों को रेटिंग देने के बाद अब सीएसई और ग्रीन रेटिंग प्रोजेक्ट ने उर्वरक बनाने वाले उद्योगों का आकलन किया है और उन्हें ग्रीन रेटिंग दी है।
    साल 1951 में देश में खाद्यान्न उत्पादन 5.2 करोड़ टन था, जो 2017-18 में बढ़ कर 27.7 करोड़ टन हो गया।जहां पहले एक हेक्टेयर में 1 किलोग्राम उर्वरक इस्तेमाल होता था, वहीं अब 1 हेक्टेयर में 135 किलोग्राम उर्वरक इस्तेमाल हो रहा है।
  • यूरिया उर्वरक उद्योग का आधार है। 2016-17 में लगभग 4.1 करोड़ टन उर्वरक का उत्पादन हुआ था, इसमें 60 फीसदी हिस्सेदारी यूरिया की थी।
  • साल 1980 में देश में जहां 60 लाख टन यूरिया की खपत हुई थी, 2017 में यह बढ़ कर 3 करोड़ टन हो गई। यूरिया उत्पादन में देशी कंपनियां प्रमुख निभा रही हैं। 2017 में देशी कंपनियों ने लगभग 2.4 करोड़ टन यूरिया का उत्पादन किया, बाकी यूरिया का आयात किया गया।
  • यूरिया उत्पादन की प्रक्रिया में ऊर्जा की बहुत जरूरत पड़ती है और कुल उत्पादन लागत में 70-80 फीसदी खर्च ऊर्जा की खपत पर होता है। इसलिए इस सेक्टर में ऊर्जा खपत और ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को सबसे अधिक वेटेज (30 फीसदी) दिया गया।
  • वायु और जल प्रदूषण और ठोस एवं खतरनाक कचरे के उत्पादन को दूसरे नंबर पर रखा गया। इसे 20 फीसदी वेटेज दी गई। इसके बाद पानी के इस्तेमाल में दक्षता को 15 फीसदी वेटेज दी गई। यूरिया उद्योग ने प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल बढ़ाया और इस समय देश में लगभग 30 फीसदी प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल यूरिया उद्योग द्वारा किया जा रहा है।  हालांकि अभी भी तीन ऐसे प्लांट हैं, जहां नाफ्था का इस्तेमाल किया जा रहा है। 
  • यूरिया उत्पादन करने वाले प्लांट्स में हर साल लगभग 191 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी का इस्तेमाल होता है। सीएसई ने सेक्टर को पानी के इस्तेमाल में दक्षता को लेकर 40 फीसदी अंक दिए हैं।
  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा उर्वरक उद्योगों को प्रदूषण के मामले में रेड श्रेणी में रखा गया है। इन उद्योगों से निकलने वाली पानी कापी प्रदूषित होता है।

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