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राज्यपाल के विवेकाधिकार

चर्चा का कारण
राज्यपाल का पद 1960 से भारतीय संघीय व्यवस्था में विशेष कर विवाद का रहा है। कभी कभी राजयपाल पर राजनितिक दलीय प्रतिबद्धता के लेकर प्रश्न उठाये जातें है, तो कभी उसके संवैधानिक कृत्य पर पक्षपात का आरोप लगाया जाता है ,तो कभी उसकी नियुक्ति को लेकर प्रश्न उठाये जाते हैं ।
वर्तमान में कर्नाटक के राज्यपाल को सरकार गठन को लेकर विवाद उठा । वहीँ राजस्थान के राज्यपाल पर चुनाव प्रचार का आरोप लगाया गया।

भारतीय संविधान और राज्यपाल का पद

  • केंद्र की तरह भारतीय राज्यों में शासन की व्यवस्था की गयी ।
  • यह व्यवस्था जम्मू कश्मीर को छोड़कर सभी राज्यों में सामान हैं । जम्मू कश्मीर का शासन सम्विधान के छठे भाग के अनुसार नहीं चलाया जाता है, जबकि उसके लिए अलग से प्रावधान किया गया है।
  • राज्यपाल राज्य का कार्यकारी /संवैधानिक प्रमुख होने के साथ -साथ केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है । इस प्रकार राज्यपाल दोहरी भूमिका निभाता है।

राज्यपाल के विवेकाधिकार से सम्बंधित मुद्दे

  • राज्यपाल से सम्बंधित विवेकाधिकार के मुद्दे सर्वाधिक चर्चा के विषय बने रहे हैं ।
  •  इन विषयों को राज्यपाल के विवेक पर आश्रित माना जाता है।
  • इन विषयों पर राज्यपाल के अधिकांश निर्णय संविधान प्रावधानों के अनुकूल नहीं माने जाते हैं जबकि राज्यपाल का तर्क होता है की उसके निर्णय संवैधानिक मान्यताओं की रक्षा करने वाले होते हैं ।

राज्यपाल के विवेकाधिकार के आधार

राज्यपालके विवेकाधिकारों को दो आधार स्तभों पर आधारित मन जाता है

1. संविधान के प्रावधान के आधार पर
2. परिस्तिथियों के आधार पर

संविधान के प्रावधान के आधार पर राज्यपाल के विवेकाधिकार

  • संविधान के अनुच्छेद 163 (1 ) तहत राज्यपाल को कुछ विवेकाधीन शक्तियां प्रदान की गयी है । इसका प्रयोग वह सम्बंधित राज्य के मंत्रिपरिषद के सलाह के बिना करता है ।
  • संविधान के अनुच्छेद राज्यपाल राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किसी विधेयक राष्ट्रपति के विचरण हेतु स्वविवेक से आरक्षित रख सकता है ।
  • राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करना राज्यपाल केसंवैधानिक विवेकाधिकार के अंतर्गत आता है । इसका प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 356 में किया गया है।
  • संविधान के अनुच्छेद 213 के द्वारा राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने की शक्ति संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत दी गयी है ।
  • कुछ राज्यों के राज्यपाल को पडोसी राज्यों /केंद्रशासित प्रदेश का बतौर प्रशासक भी नियुक्त किया जाता है।
  • असम ,मेघालय ,त्रिपुरा और मिजोरम के राज्यपाल द्वारा खनिज उत्खनन की रॉयलिटी के रूप में जनजातीय जिला परिषद् की राशि का निर्धारण करने का अधिकार दिया दिया गया है ।
  • संविधान के अनुच्छेंद 371 के द्वारा राष्ट्रपति द्वारा महाराष्ट्र एवं गुजरात के राज्यपाल को विदर्भ, मराठवाड़ और सौराष्ट्र के बारे में विशेष अधिकार दिए गए हैं ।
  • संविधान के अनुच्छेंद 371क के द्वारा राष्ट्रपति द्वारा नागालैंड के राज्यपाल को विदर्भ, मराठवाड़ और सौराष्ट्र के बारे में विशेष अधिकार दिए गए हैं ।
  • संविधान के अनुच्छेंद 371ख के द्वारा राष्ट्रपति द्वारा आसाम के राज्यपाल को विशेष अधिकार दिए गए हैं ।
  • संविधान के अनुच्छेंद 371 ग द्वारा राष्ट्रपति द्वारा मणिपुर के राज्यपाल को विशेष अधिकार दिए गए हैं ।
  • संविधान के अनुच्छेंद 371 घ तथा ड़ द्वारा राष्ट्रपति द्वारा आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के राज्यपाल को विशेष अधिकार दिए गए हैं।

परिस्थितियों के आधार पर राज्यपाल के विवेकाधिकार

1960 के बाद से राज्यों में केंद्रीय राजनीतिक दल से अलग या क्षेत्रीय राजनितिक दाल के सरकार बनने के कारण राज्यप्ल के पद विशेष विवाद का कारण बन गया ।

  • किसी विधान सभा के चुनाव में किसी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में राज्यपाल स्वविवेक से किसी को भी मुख्य मंत्री बनने के लिए आमंत्रित कर सकता है ।
  • किसी मुख्यमंत्री की असमयिक मृत्यु हो जाने तथा कोई उत्तराधिकारी नहीं होने की स्थिति में स्थिति में राज्यपाल स्वविवेक से किसी को भी मुख्य मंत्री बनने के लिए आमंत्रित कर सकता है ।
  • राज्य विधान सभा में बहुमत साबित करने के लिए समयावधि के निर्धारण में राज्यपाल स्वविवेक से निर्णय कर सकता है ।
  • राज्य विधान सभा के अल्पमत में आने पर मंत्रिपरिषद को बर्खास्त करने में राज्यपाल स्वविवेक से निर्णय कर सकता है ।
  • मंत्रिपरिषद के अल्पमत में आने पर राज्य विधान सभा को विघटित करने में राज्यपाल स्वविवेक से निर्णय कर सकता है।

 

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